प्रत्येक शब्द का सकारात्मक और नकारात्मक दो पहलू होते हैं। लेकिन सकारात्मक ही सदैव बेहतर होता है। इस दृष्टिकोण से अगर हम देखें तो, यह सच्चाई है की संविधान और कानून का अगर ईमानदारी से अनुपालन कर दिया जाए तो 99% भ्रष्टाचार, अन्याय पर नियंत्रण होगा। लेकिन दुखद स्थिति तब होती है जब हम अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए संविधान और कानून को नजर अंदाज करते हुए व्यक्तिगत लाभ पर ध्यान देते हैं और उसके लिए कार्य करते हैं जैसे मैं कहूं तो जब संविधान और कानून हमें गलत करने की इजाजत ही नहीं देता और उसका अनुपालन करने के लिए सारी व्यवस्थाएं बनी हुई है, फिर गलत होता कैसे हैं। जैसे आचार संहिता का उल्लंघन, चुनाव में काले धन का इस्तेमाल, चुनाव प्रणाली में धांधली, भ्रष्टाचार और अन्याय यहां यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा की गंगोत्री यही से आरंभ होती है। फिर गंगा का गंदा होना तो स्वाभाविक है यानी जघन्य अपराध को करने वाले लोगों को कोई सजा नहीं और मानवीय गलती या छोटी गलती के कारण किसी को जघन्य अपराधों की सजा दी जाए यह कहां का न्याय है। इसका जवाब कौन देगा। जीवन बीत जाता है अपना एक आशियाना बनाने में एक छोटी सी गलती के कारण उसे मटिया मेट करना, जिससे कि पूरे परिवार को उसकी छाया मिलती है उसे उजाड़ देना यह किस नजरिए से उचित एवं न्याय संगत है। अगर कोई आरोपी है। दोषी है तो उसे कानून के दायरे में सजा मिलनी चाहिए, सजा उसे मिलनी चाहिए परिवार को नहीं साथ-ही-साथ किसी भी गलत कार्य के लिए जिम्मेदार वह व्यक्ति तो मानवीय गलती के अंतर्गत है। इसके लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार अगर कोई है तो हमारी शासनिक व्यवस्था और प्रशासनिक व्यवस्था हमें गंभीरता से इस विषय पर चिंता करना चाहिए कि इसमें सुधार कैसे होगा। राष्ट्रीय समाजवादी जन क्रांति पार्टी।
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