शहीदे आज़म भगत सिंह की साम्राज्यवाद विरोधी विरासत को मजबूत करें, अमेरिका—इजरायल गठजोड़ के आगे मोदीराज के आत्मसमर्पण का विरोध करें!
— दीपंकर भट्टाचार्य
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से संपूर्ण आजादी के संघर्ष को पूरे भारत में नया आवेग दे देने वाली भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादतों को आज पचानवे साल पूरे हो रहे हैं. तब से अब तक रावी नदी में बहुत सारा पानी बह चुका है. जिस शहर लाहौर में अपनी प्रिय मातृभूमि को भगत सिंह ने सदा के लिए अलविदा कहा था, वह 1947 के बाद से पाकिस्तान का हिस्सा है. लेकिन आज के भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों में भगत सिंह का संदेश आज और भी महत्वपूर्ण बन गया है. वर्तमान हालात में ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ और ‘साम्राज्यवाद का नाश हो’ के नारे और भी ज्यादा प्रासंगिक और जरूरी हो चुके हैं.
भगत सिंह अपने समय के अग्रणी मार्गदर्शक क्रांतिकारी थे. केवल बारह साल की उम्र में ही उन्होंने जलियांवाला बाग में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का सबसे बर्बर चेहरा देख लिया था. जिस साल उनका जन्म हुआ था, उस वर्ष उनके चाचा अजीत सिंह ने ‘पगड़ी सम्भाल जट्टा’ के उद्घोष के साथ पंजाब में किसानों के विद्रोह का नेतृत्व किया था. जिस प्रकार 2019—20 में मोदी सरकार को कॉरपोरेट परस्त कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा था, ठीक उसी तरह 1857 के आजादी के प्रथम युद्ध के 50वें साल में पगड़ी सम्भाल जट्टा आन्दोलन ने अंग्रेज शासकों को भी तीन किसान विरोधी कानूनों को रद्द करने के लिये बाध्य कर दिया था.
खेत—खलिहानों और फैक्ट्रियों में, गांवों और शहरों में, पूरे भारत में सभी तरह के दमन, शोषण और गुलामी से मुक्ति के विरुद्ध सम्मान और आजादी की जुस्तजू ने आजादी आन्दोलन को आवेग दिया था. भगत सिंह और उनके साथियों को कामरेड लेनिन के नेतृत्व में विजयी हो चुकी रूसी क्रांति ने भी अथाह प्रेरणा और उम्मीद दी. उनकी देशभक्ति भारत को अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन से मुक्त कराने तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि वे चाहते थे कि भारत में समाजवाद की स्थापना हो और करोड़ों भारतीय मेहनतकश वास्तव में सत्ता सम्पन्न और आजाद बनें. वे यह भी जानते थे कि साम्राज्यवाद के प्रभुत्व वाली इस दुनियां में भारत कभी भी वास्तविक रूप में आजाद नहीं बन सकता है, इसीलिये उनकी राजनीति के केन्द्र में समाजवादी विचार और साम्राज्यवाद—विरोधी देशभक्ति प्रमुख तत्व थे.
1920 के दशक के भारतीय युवाओं को भगत सिंह ने जो संदेश दिया था वह आज के दौर में हमारे लिये और ज्यादा महत्वपूर्ण बन गया है. आज भारत की राजनीतिक सत्ता पूरी तरह से ‘भूरे अंग्रेजो’, यानि देश के संसाधनों को हड़पने वाले और अमेरिका—इजरायल की युद्ध और अशांति की साम्राज्यवादी धुरी के हाथों भारतीय जनता के हितों को गिरवी रखने वाले कॉरपोरेट मुनाफाखोरों और उनके राजनीतिक हिस्सेदारों, के हाथ में है. इसने देश को गम्भीर अनिश्चितता और संकट में धकेल दिया है. युद्ध से छलनी हो रहे पश्चिम एशिया के विभिन्न देशों में भारत के करीब एक करोड़ प्रवासी कामगार फंसे हुये हैं, वहीं पूरा देश ईंधन के संकट, व्यापार में अवरोध और आसमान छूती मंहगायी से तबाह हो रहा है. अमेरिका के साथ की गयी ट्रेड डील, व्यापार समझौते, ने भारत में पहले से ही घाटे का संकट झेल रहे छोटे और अति—छोटे किसानों को अत्यधिक सब्सिडी पाने व मशीनीकरण वाली अमेरिका की फॉर्म लॉबी के आगे बेहद गैरबराबरी की प्रतिद्वंदिता में धकेल दिया है.
भारत को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करने के नाम में भारत के राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक स्वायत्तता को बेचने वाले भारत के फासीवादी शासकों के खिलाफ जनप्रतिवाद को तेज करने हेतु आज भगत सिंह के वारिसों के लिये उनकी साम्राज्यवाद—विरोधी देशभक्ति की भावना को पूरी शिद्दत के साथ आगे बढ़ाने का वक्त है. भारत की विदेश नीति को अमेरिका—इजरायल धुरी के मातहत लाने के कारण अंतर्राष्ट्रीय फलक पर भारत का अलगाव बढ़ गया है. दक्षिण एशिया में हम पहले ही अपने पड़ोसी देशों के साथ अलगाव में पड़ चुके थे, अब इस्लामिक दुनियां में अपने परम्परागत मित्र देशों में एक, ईरान के साथ भी हमारी दूरी बढ़ गई है. मोदी सरकार के दिवालियेपन और विश्वासघात के बावजूद आज की परिस्थिति वर्चस्ववादी अमेरिकी साम्राज्यवाद के पतन की शुरूआत होने के संकेत दे रही हैं.
अगर ट्रम्प ने यह सोचा था कि ईरान में सत्ता परिवर्तन वेेनेजुएला या ईराक की तरह आसानी से व जल्द हो जायेगा, तो ईरान ने उसे पूरी तरह गलत साबित कर दिया है. यह विचार कि ईराक युद्ध के समय की तरह ईरान के खिलाफ युद्ध में भी पश्चिमी देशों का गठजोड़ अमेरिका—इजरायल धुरी के इर्दगिर्द मजबूती से खड़ा हो जायेगा, भी पूरी तरह गलत साबित हो चुका है. नाटो के देशों ने न केवल ईरान के खिलाफ युद्ध में जाने से इंकार कर दिया है, बल्कि वे ईराक में मौजूद अपने सैन्य ठिकानों को भी खाली कर रहे हैं. जब साम्राज्यवादी खेमे के अंदर दरारें दिखना शुरू हो गयी हैं, अमेरिका—इजरायल धुरी के खिलाफ वैश्विक स्तर पर गुस्सा बढ़ रहा है, और मोदी सरकार की नीतियां भारत को गम्भीर आर्थिक संकट एवं गहरे अंतर्राष्ट्रीय अलगाव में धकेल रही हैं, तब निश्चित रूप से भगत सिंह के उत्तराधिकारियों के लिए यह समय बुलंदी के साथ उठ खड़े होने का है.
[भाकपा माले के केंद्रीय मुखपत्र ‘लिबरेशन’ के अप्रैल 2026 केे सम्पादकीय का अनुवाद]
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