मासिक धर्म अवकाश पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आधुनिकता विरोधी
दिनकर कपूर
प्रदेश महासचिव ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट, उत्तर प्रदेश।
मासिक धर्म अवकाश पर एक वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दाखिल जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जायमाल्या बागची की पीठ द्वारा हाल ही में आया आदेश कि मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य बनाने से महिलाओं के करियर की संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और मालिक व नियोक्ता महिलाओं को नियुक्त करने से वंचित कर सकते हैं, पूर्णतया आधुनिकता व कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के विरुद्ध है।
गौरतलब है कि इस जनहित याचिका में मांग की गई थी कि संविधान के अनुच्छेद 14- समानता का अधिकार और अनुच्छेद 21- गरिमा पूर्ण जीवन के अधिकार के तहत केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया जाए कि महिला कर्मचारी और छात्राओं के लिए मासिक धर्म अवकाश की नीति बनाई जाए। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि यह नीति का विषय है इसलिए अदालत सीधे निर्देश नहीं दे सकती। सरकार चाहे तो इस विषय पर मॉडल नीति बना सकती है। अदालत ने याचिका में सीधे आदेश देने से इनकार कर दिया। जबकि खाद्यान्न सुरक्षा, मिड डे मील, समेत तमाम ऐसे विषय रहे हैं जिन पर नीति बनाने का सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में सरकार को निर्देश दिया है।
दरअसल मासिक धर्म अवकाश नीति के तहत महिलाओं व छात्राओं को मासिक धर्म के दिनों में महीने में एक-दो दिन का विशेष अवकाश पेड लीव (संवैतनिक अवकाश) का अवकाश देने की मांग की गई। ताकि वे इन दिनों थकान, बुखार, उल्टी, भंयकर दर्द, अत्यधिक रक्तस्राव जैसी स्वास्थ्य समस्याओं में आराम कर सकें। यह बेहतर उत्पादन के लिए भी बेहद जरूरी है क्योंकि पूंजीवाद का ही नियम है कि स्वस्थ मजदूर ही बेहतर उत्पादन कर सकता है।
कई चिकित्सा संस्थानों के अध्ययनों के अनुसार मासिक धर्म के दौरान लगभग 50 से 90 प्रतिशत महिलाओं को गंभीर दिक्कतों को सामना करना पड़ता है। उन्हें एंडोमेट्रियोसिस, एंडेनोमायोसिस, पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम आदि समस्याएं होती हैं। इसलिए चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं और छात्राओं को इसका सामना करने के लिए संस्थागत समर्थन और सौहार्दपूर्ण वातावरण बेहद जरूरी है।
दुनिया के तमाम देशों में मासिक धर्म अवकाश की व्यवस्था पहले से ही मौजूद है। पूंजीवादी विकसित देश जापान में 1947 से ऐसा कानून बना हुआ है। इंडोनेशिया में दो दिन और जांबिया में 1 दिन का अवकाश मिलता है। स्पेन में 2023 से पेड़ लीव दी जा रही है। दक्षिण कोरिया और चीन में भी अवकाश की व्यवस्था लागू है। भारत में हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर मासिक धर्म अवकाश का कानून नहीं बना है। हाल के वर्षों में संसद में भी इस विषय पर कई निजी विधेयक पेश हुए परंतु कानून न बन सका। लेकिन 1992 से बिहार में सरकारी महिला कर्मचारियों को महीने में दो दिन का विशेष मासिक धर्म अवकाश मिलता है। कर्नाटक में हाल ही में राज्य सरकार ने ऐसा कानून लागू किया है। केरल में कुछ विश्वविद्यालय में छात्राओं को यह अवकाश दिया जा रहा है। कुछ निजी कंपनियां भी जैसे जोमैटो, स्विग्गी, बायोजूपीस, एकर इंडिया, एलएनटी, ओरिएंट इलेक्ट्रिक, जो जैपो आदि मासिक धर्म अवकाश की सुविधा प्रदान करती हैं। इसलिए यह कहना की इस सुविधा की मांग पर नियोक्ता काम नहीं देंगे असंगत और तथ्यों से परे है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के इन्हीं मुख्य न्यायाधीश द्वारा घरेलू कामगार महिलाओं को न्यूनतम मजदूरी देने के कानून के लिए दाखिल याचिका को खारिज करते हुए भी इसी तरह का आदेश हाल के दिनों में दिया था। दरअसल सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणियां महज किन्हीं एक दो न्यायाधीशों का व्यक्तिगत मामला नहीं है। यह भारतीय राज्य के कल्याणकारी चरित्र से तानाशाही व लोकतंत्र विरोधी चरित्र में परिवर्तन का प्रतिबिंबन है। भारतीय राज्य, हिंदुत्व और कॉर्पोरेट संश्रय ने भारतीय संविधान में मौजूद आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर हमला बोल दिया है। मूल अधिकारों व नीति निर्देशक तत्वों में दिए गए राज्य के दायित्व को एक-एक कर खत्म किया जा रहा है। लाए गए मजदूर विरोधी लेबर कोड इसका जीवंत उदाहरण हैं। जिसमें काम की घंटे 12 कर दिए गए, न्यूनतम मजदूरी से भी कम फ्लोर लेवल वेज लाई गई, सामाजिक सुरक्षा विहीन फिक्स टर्म इम्पलाइमेंट जैसे आधुनिक गुलामी के प्रावधान तो हैं ही साथ ही महिला मजदूरों को रात्रि पाली में काम करने के प्रतिबंध को हटा दिया गया है और महिला मजदूरों की कार्यस्थल पर प्राप्त सुरक्षा को कमजोर किया गया है।
वास्तव में ‘व्यापार करने में आसानी’ के नाम पर कॉर्पोरेट लाभ के लिए श्रमिक अधिकारों को समाप्त करने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। बहरहाल आधुनिक गुलामी थोपने की इन कोशिशों का मजदूर आंदोलन, महिला आंदोलन और लोकतांत्रिक ताकतों द्वारा प्रतिरोध जारी है। ‘महिलाओं के मासिक धर्म अवकाश और निशुल्क मासिक धर्म उत्पादों की उपलब्धता का अधिकार अधिनियम’ बनाने की मांग जोर पकड़ रही है जो आने वाले समय में सड़क से लेकर संसद तक दिखाई पड़ेगी।
दिनांक 15 मार्च 2026
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