छत्तीसगढ़ के प्रगतिशील सांस्कृतिक कर्मियों /साहित्यकारों से एक अपील
आप सभी को नववर्ष पर क्रांतिकारी अभिनंदन
साथियों,
हमारे विचार से छत्तीसगढ़ की फासिस्ट डबल इंजन सरकार के तत्वावधान में आयोजित रायपुर साहित्य महोत्सव का बहिष्कार या विरोध बहुत जरूरी है ।लेकिन उसके पीछे लेखक मनोज रूपडा के साथ गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के संघी कुलपति द्वारा किए तानाशाही पूर्ण व्यवहार ही एक मात्र कारण नहीं होना चाहिए।निश्चित रूप से मनोज जी के साथ हुई बद्तमीजी और लेखक बिरादरी के अपमान के खिलाफ छत्तीसगढ़ के प्रगतिशील संस्कृतिकर्मियों की पहल पर देश भर में विरोध हुआ है और हो रहा है।ये निश्चित रूप से आशाजनक संकेत है।हम सब ये भी जानते हैं कि आज फासिस्ट संघ परिवार का एक महत्वपूर्ण एजेंडा है भारत के इतिहास और संस्कृति का विकृतिकरण व सांप्रदायीकरण।इसीलिए आज तमाम विश्वविद्यालयों,शैक्षणिक संस्थानों,सांस्कृतिक साहित्यिक अकादमियों में फासिस्ट संघ परिवार ने अपने लोगों को बिठाया है।लेकिन हमारे विचार से सिर्फ साहित्यिक बिरादरी के अपमान के मुद्दे पर रायपुर साहित्य महोत्सव का विरोध करना शायद अपने उद्देश्यों को अधूरे रूप से रखना होगा।आज की तारीख में छत्तीसगढ़ संघी मनुवादी फासीवादी ताकतों के मार्गदर्शन में हिंदुराष्ट्र के एक नए मॉडल के रूप में उत्तर प्रदेश के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दौड़ रहा है।
प्रगतिशील सांस्कृतिकर्मियों और साहित्यकारों का यह सामाजिक दायित्व है कि वे राज्य को अल्पसंख्यकों खासकर ईसाइयों की कत्लगाह बनाने की खिलाफत करें।क्या रायपुर साहित्य महोत्सव के विरोध में यह मुद्दा नहीं उठना चाहिए कि एक आदिवासी बहुल राज्य होते हुए भी यहां अडानी अंबानी जिंदल सरीखे महाभ्रष्ट कॉरपोरेट घरानों के द्वारा प्राकृतिक संसाधनों की लूट को तेज करने के लिए सबसे ज्यादा दमन आदिवासी समाज का हो रहा है?एक पेड़ मां के नाम कहने वाली भाजपा सरकार ने तो पूरा का पूरा हसदेव जंगल को अडानी को सौंप दिया है।बस्तर में माओवाद के सफाया के नाम पर आदिवासियों को झूठे मुठभेड़ों में मारना,बड़े पैमाने पर उनका जनसंहार करना ,राज्य की जेलों को निर्दोष आदिवासियों से भर देना और आदिवासी महिलाओं के साथ असंख्य यौन अत्याचार करना तो दुनिया के सबसे बड़े और सबसे पुराने फासीवादी संगठन RSS के विकसित भारत की फितरत है।एक के बाद एक कथावाचक जो घोर महिला विरोधी हैं,आपराधिक पृष्ठभूमि से हैं,छिछोरों की तरह बातें करते हैं और संघ परिवार के निर्देश पर राज्य में अल्पसंख्यकों ,दलितों और महिलाओं के खिलाफ नफ़रत व विभाजन का जहर फैलाकर यहां की शांतिपूर्ण फिज़ा को दूषित कर रहे हैं और हिंसक हिंदुत्व की कथा गा रहे हैं।क्या ये विषय हमारे प्रगतिशील रचनाधर्मियों को अपनी रचनाओं /कला का सृजन करने के लिए अपील नहीं करते ? छत्तीसगढ़ के एक गरीब मजदूर रामनारायण बघेल को केरल में बांग्लादेशी कहकर मोबलिंचिंग में भगवा गिरोह द्वारा मार डाला जाता है।बंगाल के नागरिक 8 मजदूरों को चूंकि वे मुस्लिम थे और मजदूरी बढ़ाने की बात कर रहे थे,राज्य के सूरजपुर जिले में बांग्लादेशी कहकर बेरहमी से इतना पिटा गया कि चार मजदूर अभी भी गंभीर रूप से घायल हैं।कांकेर में आदिवासी सरपंच जो ईसाई है के पिता की लाश को कब्र से पुलिस प्रशासन के संरक्षण में उखाड़ लिया जाता है,अज्ञात स्थान पर ले जाया गया है और बजरंग दल द्वारा ईसाइयों और उनके धर्मस्थलों के खिलाफ तांडव किया जाता है ।हद तो तब हो गई जब इसी मुद्दे पर क्रिसमस के दिन भगवा गुंडों द्वारा जो कांकेर में हुई हिंसा और तोड़फोड़ के लिए जिम्मेदार हैं ,के द्वारा राज्य सरकार के संरक्षण में छत्तीसगढ़ बंद करवाया जाता है।बंद के दौरान ईसाइयों पर,मॉल कर्मचारियों पर हमला किया जाता है और बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ की जाती है ।पूरे देश के लोगों ने देखा था की कैसे और किन बजरंग दल के गुंडों ने गुंडागर्दी की थी लेकिन छत्तीसगढ़ पुलिस ने पहले तो गिरफ्तार करने में हिलहवाला किया फिर इतने हल्के धारा लगाये कि उन्हें आसानी से जमानत मिल गई।फिर संघ भाजपा के नेताओं ने बिल्किस बानो मामले के बलात्कारी हत्यारों के स्वागत की तरह इन भगवा गुंडों का भी स्वागत किया और सार्वजनिक रूप से उन्हें सम्मानित किया।क्या ये विषय या केरल की दो ननों के साथ नारायणपुर की आदिवासी बालाओं पर बजरंग दल का हमला और यौन प्रताड़ना फिर जेल में बंद करना ,या फिर तीन मुस्लिम नौजवानों को गौ तस्करी के झूठे आरोप में आरंग में बजरंग दल द्वारा पीट पीट कर हत्या करना और फिर आज तक उन्हें इंसाफ नहीं मिलना हम संस्कृति कर्मियों के लिए विरोध प्रदर्शन का मुद्दा नहीं बनता?पूरे छत्तीसगढ़ के माहौल में सिर्फ और सिर्फ नफ़रत और विभाजन के जहर को इतना फैला दिया गया है कि प्रतिरोध की ताकतें या जो आज संघी मनुवादी फासीवादी ताकतों के बुलडोजर के नीचे सबसे ज्यादा पीस रहे हैं जैसे कि दलित/ उत्पीड़ित, आदिवासी महिला ,अल्पसंख्यक समुदाय,विद्यार्थी, युवा,कर्मचारी,बुद्धिजीवी,किसान ,मजदूर और आम जनता आपस में बंटी रहे या खौफ के साए में जीवन बिताने को मजबूर हों।
हमारे विचार से प्रगतिशीलता की कसौटी सिर्फ मंच से अपनी रचनाओं को पढ़ना,पुस्तकों का विमोचन या डबल इंजन फासिस्ट सरकार के द्वारा पोषित / परिचालित साहित्यिक आयोजनों में सम्मानित होना नहीं है।सच्चे जन पक्षधर साहित्यकारों का सामाजिक सरोकार कला ,कला के लिए नहीं बल्कि जनता के लिए होता है और ऐसे सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध लेखकों को ही जनता का सम्मान मिलता है।2015 में जब संघी मनुवादी फासीवादी ताकतों के द्वारा पैदा असहिष्णुता और प्रोफेसर कलबुर्गी,कॉमरेड गोविंद पंसारे की भगवा गिरोह द्वारा हत्या के खिलाफ बहुत सारे प्रतिष्ठित लेखकों ने अपने साहित्य अकादमी अवॉर्ड को लौटाया था,तब वास्तविक रूप से देश के सच्चे देशभक्त और सामाजिक सरोकार वाले रचनाकारों की एकता और विरोध को हैरत के साथ पूरे देश ने देखा था।इससे संघी मनुवादी फासीवादी ताकतें हिल गई थी।बहुत परेशान हो गई थीं।
हम क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच के साथी,रायपुर साहित्य महोत्सव के और बिलासपुर केंद्रीय विश्वविद्यालय के तानाशाह संघी कुलपति के पूरी तरह विरोध में हैं और लेखक मनोज रूपडा के साथ हैं।साथ ही हम तमाम प्रगतिशील संस्कृति कर्मियों / रचनाकारों से अपील करते हैं कि वे छत्तीसगढ़ में भगवा गिरोह के द्वारा पैदा की गई भीषण असहिष्णुता,साम्प्रदायिक कट्टरता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने को तत्पर फासीवादी नापाक मंसूबों का प्रबल विरोध करें ,साझा सांस्कृतिक प्रतिरोध खड़ा करें।साथ ही इन मुद्दों को रायपुर साहित्य महोत्सव के विरोध से जोड़ें।तब प्रदेश और देश की जनता के पास सही संदेश जाएगा।
रायपुर साहित्य महोत्सव का टैगलाइन ” यह सिर्फ एक मंच नहीं बल्कि विचारों की होगी नई शुरुआत ” के विरोध में हमें साझा सांस्कृतिक प्रतिरोध बुलंद करना चाहिए कि हमें हिंदुत्व के हिंसक विचार नहीं चाहिए । बहुलतावादी परम्परा को खत्म करने वाला और हिंदी,हिन्दू,हिन्दुस्तान के जहरीले विचार को बढ़ावा देने वाला साहित्य महोत्सव नहीं चाहिए।हमें ब्रिटिश साम्राज्य विरोधी स्वतंत्रता संग्राम की सांझी शहादत साझी विरासत वाले विचार और सज्जाद जहीर ,मुंशी प्रेमचंद, फैज़,सुकांत भट्टाचार्य,अमृता प्रीतम,गुरशरण सिंह, चेरबंदा राजू,महाश्वेता देवी,अवतार सिंह पाश जैसे साहित्यकारों से रची बसी देश की गंगा जमुनी तहज़ीब पर नाज़ है।आइए असहिष्णुता ,सांप्रदायिक कट्टरपंथ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने के विरोध में हम आगे आएं और संघी एजेंडे वाले रायपुर साहित्य महोत्सव के विरोध में मिलकर अपनी आवाज बुलंद करें।
तुहिन,असीम गिरी
अखिल भारतीय संयोजक
क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच (कसम) RCF
15 जनवरी 2026
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