अपने लेख,” कार्ल मार्क्स का कम्युनिस्ट पार्टियों के नाम एक काल्पनिक पत्र ” में राजद राज्यसभा सांसद मनोज झा ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों को प्रभावित कर रहे चंद लक्षणों का उल्लेख किया है। खास तौर से उनके सैद्धांतिक विचारधारात्मक ठहराव, जीवंत सामाजिक सच्चाइयों से अपने को जोड़ न पाने और जाति के प्रश्न पर यांत्रिक दृष्टिकोण को।
अपने पहले पैराग्राफ में वे कहते हैं कि मार्क्सवादी श्रेणियां वर्ग, मज़दूर, सरप्लस के शोषण भारत में समझ में आने वाली नहीं हैं। वास्तव में ये अवधारणाएं न तो विदेशी हैं न ही भारत में अमूर्त हैं। वे दैनंदिन जीवन के अनुभवों और आम राजनीतिक भाषा से जुड़ी हुई हैं। मजदूर, किसान, असंगठित मजदूर जैसी श्रेणियां, यहां तक कि ग्रामीण गरीब जैसे शब्द शोषण बेदखली और अपने श्रम के सरप्लस से वंचित किए जाने से सीधे जुड़े हुए हैं। समस्या यह है कि इन श्रेणियों को कैसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के खिलाफ राजनैतिक ताकत में बदला जाय।
दूसरा बिंदु उन्होंने यह उठाया है कि मार्क्सवाद को कभी भी एक सिद्धांत नहीं माना गया था। यहां समस्या पद्धति और सिद्धांत को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की है। पद्धति सिद्धांत के बिना अंधी और मृत है। ठीक वैसे ही सिद्धांत के बिना पद्धति खोखली है। वे प्रैक्सिस (सिद्धांत को व्यवहार में मिलाना) द्वंदात्मक संबंध में काम करते हैं।
यह सच है कि आज तमाम राजनीतिक धाराओं की सैद्धांतिक स्थिति 20वीं सदी की औद्योगिक समस्याओं के अनुरूप नहीं है। यह 21वीं सदी की बहुसंख्यकवादी राजनीति और वित्तीय पूंजी की चुनौतियों का मुकाबला कर पाने में विफल है।अब एक नए विश्लेषण की आलोचनात्मक पद्धति की ओर लौटने की जरूरत है। जिसके लिए सैद्धांतिक नवीकरण की जरूरत हो सकती है।
तीसरे बिंदु में वह जाति को वर्ग से अलग कर देती है। यहां वे वैचारिक द्वंद्व के पुराने मोड में हैं जहां बुनियादी ढांचे और अधिसंरचना (superstructure) को अलग करके विमर्श किया जाता था।चर्चित मार्क्सवादी डी. डी. कौशांबी जाति को वर्ग का नवजात रूप मानते थे। विनोद मिश्र जिन्होंने बिहार खासतौर से भोजपुर में सिद्धांत और व्यवहार की प्रैक्सिस पर काम किया, जाति को अवर्गीकृत वर्ग मानते थे। इसके अलावा ईएमएस नंबूदरीपाद का मूल सिद्धांत था कि जाति एक तरह का उत्पादन संबंध है जिसके माध्यम से सरप्लस वसूला जाता था। यद्यपि अंबेडकर के विचार में जाति एक स्वायत्त निकाय है जिसे वर्ग में सीमित नहीं किया जा सकता। वैसे तो वर्ग और जाति के बीच जारी अनवरत बहस भारतीय सच्चाई को समझने में केंद्रीय सैद्धांतिक राजनीतिक विभाजन रेखा है। आज ठोस कार्यभार कार्पोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ के खिलाफ लड़ाई है और इसके लिए जरूरत है कि आर्थिक शोषण व सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ एक साथ लड़ा जाय।
इसके लिए एक ऐसे लोकतांत्रिक मंच की जरूरत है जहां अलग अलग विचार के लोग समग्रता में संविधान, आजीविका और राष्ट्र की स्वायत्तता के लिए एक साथ मिलकर लड़ें।
आखिरी बात यह कि उक्त लेख संविधान को मात्र पूंजीवादी समझौता मानने से इंकार करता है, बल्कि संवैधानिक अधिकारों की रक्षा को जनता के भौतिक जीवन की बेहतरी के लिए निर्णायक रणक्षेत्र मानता है क्योंकि यह उपनिवेशवाद विरोधी तथा जातिविरोधी भावना का मूर्त रूप है। मैं यह समझ पाने में असमर्थ हूं कि जहां संविधान की रक्षा में सब लोग एक हों, वहां आखिर यह सुझाव क्यों। मुझे उम्मीद थी कि लेखक यह व्याख्या करेंगे कि क्यों पहचान की जातिवादी राजनीति राजनीतिक अर्थशास्त्र से अलग होनी चाहिए ? क्या यह जाति विनाश की राजनीति है ?
अखिलेन्द्र प्रताप सिंह
संस्थापक सदस्य,
आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
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