” 77 वें गणतंत्र दिवस (ओपनिवेशिक आजादी) पर विशेष आजाद खेमसिंह फौजदार (संस्थापक-भारतीय नौजवान इंकलाब पार्टी) की कलम से “
प्यारे देशवासियो सादर जयहिंद!
. साथियो मैं आजाद खेमसिंह फौजदार संस्थापक भारतीय नौजवान इंकलाब पार्टी!मेरी अपील को ध्यान से पढ़ो और सुनो,आप देखते चले आ रहे हैं कि हर वर्ष लालकिले कि प्राचीर से 15 अगस्त सन 1947 से लेकर आज तक, सभी प्रधनमंत्री नौजवान, किसान,मजदूरों का आह्वान करते चले आ रहे हैं!कि देश का बोझ तुम्हारे कंधो पर है!लेकिन यह बात वास्तविकता से कोसों दूर है!वास्तविकता यह है कि, आज तक सभी राजनितिक पार्टियों के नेताओं द्वारा आपको अपनी शक्ति व सत्ता प्राप्त करने हेतु हथियार के रूप मैं इस्तेमाल किया जाता आ रहा है!
. सोचो सदियों से सोने कि चिड़िया कहे जाने वाले देश का अधिकांश मनुष्य एकदम दिन में कितनी बार मर रहा है!क्या कभी सोचा है कि जीने का उद्देश्य क्या है? क्या कभी सोचा है कि समाज का कोई भी व्यक्ति गरीब हो या अमीर प्रत्येक मानव को क्या जरुरी है? क्या इन दुखों, कष्टों से भरे सडे श्वासों को ही आजादी का जीवन मान लिया है? ऐसी नर्क भरी जिन्दगी से तो एकदम बार मर जाना बेहतर है!जिसके लिए स्वतन्त्रता संग्राम के अमर शहीदों ने अपनी सड़ी, गली गुलामियत की दुखान्त जिन्दगी को ठुकराकर सुख व सम्मान से भरे दो-चार दिनों के जीवन को ही बेहतर समझा था!
. साथियो नौजवान राष्ट्र व समाज का प्रहरी एवं किसान और मजदूर देश की रीढ़ होता है!किन्तु सन 1947 से आज तक इन स्वार्थी नेता व सरकारों से मिला क्या है? समाज को सर्वप्रथम सदाचार की आवश्यकता थी, लेकिन सदाचार को तो रसातल में पहुंचा दिया गया है!किन्तु सदाचार के बदले समाज को परोसा गया है व्यभिचार, दुराचार, अनाचार, पापाचार, हत्याचार आदि-आदि!
. साथियो वक्त है सम्भल जाने का आजादी,अधिकार और स्वराज भीख में नहीं मांगे जाते बल्कि एकता,वीरता और विचारों के बल पर प्राप्त किये जाते हैं!फिर नौजवानों लगाओ नारा आज और अभी यहीं जिस रूप और हाल में हो ” इंकलाब जिंदाबाद ” इस नारे का अर्थ चहुमुखी – क्रन्तिकारी परिवर्तन है!क्रांति अपराध नहीं, घृणा नहीं, किसी को नस्ट करना नहीं!क्रांति से नवीनता को धारण करना होता है!जैसे दुखों का त्याग-सुख की खोज, बंधनों का त्याग-स्वतन्त्रता की खोज, भूख का त्याग -तृप्ति की खोज, विपन्नता का त्याग -सम्पन्नता की खोज!अर्थात ” शांति ” प्राप्त करना व विकास करना है!
नौजवान साथियो आज तक सभी राजनैतिक पार्टी व उनके नेतागण कहते आ रहे हैं कि हमने कृषि, शिक्षा, व उद्योगों को उन्नत किया है!लेकिन मैं नहीं मानता!
साथियो ध्यान दो आज तक कृषि की उन्नति-कृषक की अवनती,शिक्षा की उन्नति – छात्रों की अवनती, उद्योगों की उन्नति -मजदूरों की अवनती ही तो की गयी है!देश को झूठे नारे व कागजी आंकड़ों के आधार पर चलाया जा रहा है!
क्या इसी को गणतंत्र व स्वतन्त्रता कहते हैं!अगर इसे ही कहते हैं तो पूछो रिक्शा चालकों से समानता, पूछो झुग्गी -झोंपडियों में रहने वालों से कि भारत उदय क्या होता है? पूछो पत्थर तोड़ने वालो से लोकतंत्र, पूछो मलमूत्र साफ करने वालों से समाजवाद
, पूछो किसानो से स्वतन्त्रता, पूछो मजदूरों से स्वराज, पूछो कूड़ा-कबाड़ा बीनने वाले उन मासूम बच्चों व महिलाओं से कि गणतंत्र का क्या अर्थ होता है? पूछो अमेरिका के आगे सलाम ठोकने वाले उन नेताओं से कि सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्नता का क्या अभिप्राय है? क्या कभी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, राजनैतिक, सत्ता का विकेंद्रीयकरण हो सकेगा? जिसके n होने कि बजह से देश का भविष्य आशा कि लालिमा नहीं, बल्कि भय की कालीमा की ओर बढ़ रहा है!जिसके फ्लस्वरूप बेरोजगारी, दरिद्रता, अशिक्षा, राष्ट्रीय चारित्रिकता पतन, अन्याय, वेश्यावृती, भिक्षावृति, अपराध, धर्मन्धाता, जातिवाद, छुआछूत, नशा, दंगा, फसाद, आत्महत्या, भ्रस्टाचार एवं उग्रवाद जैसी तमाम समस्याएं ससमाज में पैदा हो रही हैं!
अतः मेरे नौजवान साथियो तुम्हारे विचारों से ही देश में सत्ता परिवर्तन होता है, ठीक उसी तरह तुम्हारे संगठित होने तथा वर्तमान व्यवस्था को उखाड़ फैकने और नई व्यवस्था कायम करने हेतु बिगुल बजाने का संकल्प लें!
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