भारत द्वारा इज़राइल की आलोचना वाले संयुक्त राष्ट्र वक्तव्य से दूरी: हिंदुत्व–ज़ायनवादी गठजोड़ की मज़बूती का संकेत!
हिंदुत्व–ज़ायनवादी इसराइली गठजोड़, जिसकी साझा वैचारिक आधारभूमि मुस्लिम-विरोध या इस्लामोफोबिया है, के सुदृढ़ होते संदर्भ में भारत ने 17 फरवरी को संयुक्त राष्ट्र में 85 देशों द्वारा जारी उस संयुक्त वक्तव्य से स्वयं को अलग रखा, जिसमें पश्चिमी तट (वेस्ट बैंक) पर इज़राइल द्वारा अपने अवैध नियंत्रण को कड़ा करने की आलोचना की गई थी। वक्तव्य में कहा गया है: “हम इज़राइल के उन एकतरफा निर्णयों और कदमों की कड़ी निंदा करते हैं जिनका उद्देश्य पश्चिमी तट में उसकी अवैध उपस्थिति का विस्तार करना है।”
भारत द्वारा अपनाया गया यह शर्मनाक रुख 25 फरवरी को मोदी की प्रस्तावित इज़राइल यात्रा से भी जुड़ा है, साथ ही हिंदुत्व शासन की अमेरिका के प्रति नई गुलामी की प्रवृत्ति से भी, क्योंकि ट्रंप-नेतृत्व वाला तथाकथित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ वॉशिंगटन में बैठक करने जा रहा है।
निस्संदेह, यह कोई अचानक हुआ विकास नहीं है। मोदी शासन के तहत भारत ने फिलिस्तीनियों के विरुद्ध इज़राइल की आपराधिक कार्रवाइयों के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में लाए गए अनेक प्रस्तावों से दूरी बनाई है। पिछले दो वर्षों में यह प्रवृत्ति और स्पष्ट हुई है। उदाहरणस्वरूप—अक्टूबर 2023 में संयुक्त राष्ट्र महासभा का वह प्रस्ताव जिसमें इज़राइल-हमास संघर्ष में तत्काल युद्धविराम की मांग की गई थी; दिसंबर 2023 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) से इज़राइल के “लंबे कब्ज़े” पर कानूनी राय मांगने वाला प्रस्ताव; जून 2025 में गाज़ा में “तत्काल, बिना शर्त और स्थायी” युद्धविराम का आह्वान करने वाला प्रस्ताव आदि।
यद्यपि शीतयुद्धोत्तर नवउदारवादी दौर में 1990 के दशक से फिलिस्तीन के प्रति भारत की दृढ़ एकजुटता में कुछ शिथिलता आई थी, परंतु ज़ायनवादी शासन के साथ भारत की रणनीतिक निकटता में निर्णायक मोड़ 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने और 2017 में मोदी की इज़राइल यात्रा—जो किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी—के साथ आया।
यह स्मरणीय है कि फिलिस्तीन प्रश्न पर भारत का रुख उसकी उपनिवेश-विरोधी विरासत और विश्व के उत्पीड़ित जनों के साथ एकजुटता से अविभाज्य रूप से जुड़ा रहा है। इसी दृष्टिकोण के आधार पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1938 में ही फिलिस्तीन में एक यहूदी राज्य की स्थापना का दृढ़ विरोध करते हुए उसे “अनुचित और अमानवीय” बताया था। उन्होंने तर्क दिया था कि फिलिस्तीन मूल निवासी अरबों का है और साम्राज्यवादी सहायता से वहां एक राज्य थोपना मानवता के विरुद्ध अपराध है। गांधी ने स्पष्ट कहा था: “फिलिस्तीन अरबों का है, उसी प्रकार जैसे इंग्लैंड अंग्रेज़ों का या फ्रांस फ़्रांसीसियों का।”
स्वतंत्रता संग्राम के दौर और नेहरू काल में, तथा गुटनिरपेक्ष आंदोलन के हिस्से के रूप में, भारत लगातार फिलिस्तीनियों और उत्पीड़ित अरब जनों के साथ खड़ा रहा। उदाहरण के लिए, भारत 1974 में फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) को मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश था और 1988 में फिलिस्तीन राज्य को मान्यता देने वाले शुरुआती देशों में शामिल था।
जबकि भारत की व्यापक उपनिवेश-विरोधी धारा इसराइली ज़ायनवाद के विरोध में थी, वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), जिसका तथाकथित ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ वस्तुतः साम्राज्यवादी सेवा का आवरण है, अपने प्रारंभ से ही अलग रुख अपनाता रहा है। सावरकर और गोलवलकर दोनों ही ज़ायनवादी उद्देश्य के प्रति सहानुभूति रखते थे और ज़ायनवाद अथवा राजनीतिक यहूदीवाद को हिंदुत्व या राजनीतिक हिंदूवाद पर आधारित ‘हिंदू राष्ट्र’ के मॉडल के रूप में देखते थे। आज नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी, जो RSS का राजनीतिक औजार है, के शासन में इज़राइल के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी—जिसमें आर्थिक और सैन्य समझौते शामिल हैं—हिंदुत्व की इसी सोच के अनुरूप है।
“हिंदुत्व भारत” और “ज़ायनवादी इज़राइल” के नारे तथा भगवा–ज़ायनवादी गठजोड़ को गहरा करने की प्रवृत्ति, अपने गहरे मुस्लिम-विरोधी वैचारिक आधार के साथ, आज के भारतीय नव-फासीवादी परिदृश्य में प्रमुख राजनीतिक विमर्श बन चुकी है।
85 देशों के संयुक्त वक्तव्य ने वस्तुतः ट्रंप के तथाकथित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पोल खोल दी है और 1967 से कब्ज़े में लिए गए समूचे फिलिस्तीनी क्षेत्र—जिसमें पूर्वी यरुशलम भी शामिल है—की जनसांख्यिकीय संरचना और स्थिति को बदलने के इज़राइली प्रयासों का विरोध किया है। किंतु इस पहल से मोदी शासन का दूर रहना निंदनीय है। उल्लेखनीय है कि भारत BRICS का एकमात्र संस्थापक सदस्य है जिसने इस पहल का समर्थन नहीं किया, जबकि यूरोपीय संघ और क्वाड साझेदार—जापान तथा ऑस्ट्रेलिया—ने भी इसे समर्थन दिया।
इसी बीच, अंतरराष्ट्रीय समुदाय में व्यापक आलोचना और अलगाव के बाद, एक विलंबित ‘औपचारिक संतुलन’ साधने के प्रयास के रूप में, भारत ने संयुक्त वक्तव्य से बाहर रहते हुए भी पश्चिमी तट पर इज़राइल की एकतरफा कार्रवाइयों की आलोचना करने वाले देशों की सूची में अपना नाम जोड़ा है। इस तथाकथित ‘चेहरा बचाने’ की कवायद के माध्यम से भारत ने न तो ज़ायनवादी इसराइली शासन को और न ही अमेरिकी साम्राज्यवाद को नाराज़ करने की स्थिति से बचने की कोशिश की है।
मोदी की आगामी इज़राइल यात्रा हिंदुत्व–ज़ायनवादी इसराइली गठजोड़ को और मज़बूत करने की दिशा में संकेत देती है।
हम सभी प्रगतिशील–जनतांत्रिक शक्तियों से अपील करते हैं कि वे फिलिस्तीनी जनता के साथ एकजुटता में खड़े हों और मोदी शासन के इस निंदनीय इसराइली ज़ायनवाद-समर्थक कदम का विरोध करें।
पी. जे. जेम्स
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