मध्य-पूर्व की भू-राजनीतिक और आर्थिक संरचना

मध्य-पूर्व की भू-राजनीतिक और आर्थिक संरचना

अमेरिका-ज़ायोनिस्ट इसराइली आक्रमण के विरुद्ध ईरान के वीरतापूर्ण प्रतिरोध के साथ एकजुटता में!

सभी अंतरराष्ट्रीय कानूनों तथा द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बने समझौतों, संधियों और विधान व्यवस्थाओं का उल्लंघन करते हुए 28 फ़रवरी 2026 से ईरान के विरुद्ध शुरू हुआ अमेरिका-ज़ायोनिस्ट इसराइली आक्रमण लगातार जारी है और इसकी भयावहता बढ़ती जा रही है।

यह उकसावे के बिना किया गया विश्वासघाती हमला उस समय शुरू किया गया जब ईरान के साथ वार्ताएँ चल रही थीं। दुनिया की जनता का सबसे बड़ा दुश्मन अमेरिकी साम्राज्यवाद तथा उसका मध्य-पूर्व में सामरिक सैन्य चौकी के रूप में काम करने वाला ज़ायोनिस्ट इसराइली शासन इस आक्रमण के पीछे हैं।

इस आक्रमण की शुरुआत ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की हत्या से हुई और इसके साथ ही ईरान के एक प्राथमिक विद्यालय पर बमबारी की गई, जिसमें लगभग 175 लोगों की हत्या कर दी गई, जिनमें 160 मासूम बच्चे थे।

इसने पूरे मध्य-पूर्व को अस्थिर कर दिया है। अभूतपूर्व स्तर पर नागरिक हताहत, पर्यावरणीय विनाश और आर्थिक संकट—जिसमें तेल की कीमतों में तेज़ उछाल भी शामिल है—अब मध्य-पूर्व से बाहर फैलकर पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहे हैं।

और भी गंभीर चिंता यह है कि ईरान के वीरतापूर्ण प्रतिरोध के कारण स्थिति परमाणु युद्ध के जोखिम की ओर धकेली जा रही है—जो उस कानूनविहीन ज़ायोनिस्ट इसराइली शासन से जुड़ा संभावित खतरा है जिसने अपने साम्राज्यवादी सहयोगियों के समर्थन से अवैध रूप से परमाणु हथियार हासिल किए हैं।

युद्ध का अंतिम परिणाम चाहे जो भी हो, एक बात स्पष्ट हो चुकी है: मध्य-पूर्व की भू-राजनीतिक और आर्थिक संरचना तथा वैश्विक शक्ति संतुलन पर उसका प्रभाव अब पहले जैसा नहीं रहेगा।

यह क्रूर साम्राज्यवादी आक्रमण एक बार फिर आज की विश्व-स्थिति की सच्चाई उजागर करता है, जहाँ एक ओर धुर-दक्षिणपंथी, नव-फासीवादी और राजनीति विहीन दुनिया का माहौल है और दूसरी ओर ईरान अकेले दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य मशीन का सामना कर रहा है।
यह मशीन अब एक लापरवाह और बच्चों का यौन शोषण करने वाले विकृत चरित्र शासक द्वारा चलाई जा रही है—जो साम्राज्यवाद और उसकी संस्थाओं के चरम पतन और सड़ांध का प्रतीक है।
इसका एक उदाहरण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जीसीसी (खाड़ी सहयोग परिषद) द्वारा प्रस्तुत हालिया प्रस्ताव है, जिसे भारत सहित 135 देशों ने समर्थन दिया और भारत ने तो इसे सह-प्रायोजित भी किया।इस प्रस्ताव में ईरान द्वारा किए गए सभी हमलों को तुरंत रोकने की मांग की गई और उस पर “हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में अंतरराष्ट्रीय नौवहन को बाधित करने” का आरोप लगाया गया।अमेरिका-ज़ायोनिस्ट इसराइली आक्रमण की स्पष्ट निंदा करने के बजाय यह प्रस्ताव साम्राज्यवादी ताकतों के सामने शर्मनाक आत्मसमर्पण और नव-औपनिवेशिक अधीनता का उदाहरण बन गया।यह संतोषजनक है कि अफ्रीका-एशिया-लैटिन अमेरिका के कई देशों ने इस एकतरफा और इस्लामोफोबिक प्रस्ताव से दूरी बनाए रखी, जबकि चीन और रूस ने भी अपने साम्राज्यवादी हितों के तहत इसका समर्थन नहीं किया।
और भी शर्मनाक है खाड़ी देशों की राजनीतिक अक्षमता, जो अमेरिकी हितों से बंधे हुए हैं और अपने यहां स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों को हटाने की मांग तक नहीं कर पा रहे हैं।ये सैन्य अड्डे क्षेत्र में शांति और सुरक्षा के लिए खतरा बन चुके हैं और युद्धोत्तर नव-औपनिवेशिक दौर में मध्य-पूर्व की अस्थिरता का सबसे बड़ा स्रोत हैं।

इसी बीच ईरान ने आत्मरक्षा के तहत मध्य-पूर्व के विभिन्न देशों—जैसे इराक, कुवैत, जॉर्डन और संयुक्त अरब अमीरात—में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं।यह अमेरिकी महाशक्ति के अहंकार पर अभूतपूर्व प्रहार है और इससे उसके महंगे सैन्य ढांचे को भारी नुकसान हुआ है।इसके साथ ही ईरान ने हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाले मार्ग को भी सीमित कर दिया है, जिसके माध्यम से विश्व के लगभग 20 प्रतिशत तेल (जिसके 40 % तेल का आयात भारत द्वारा किया जाता है,जो कि अमरीका का पिछलग्गू है )व्यापार का आवागमन होता है।
ताज़ा जानकारी के अनुसार रूस और चीन जैसे मित्र देशों को छोड़कर नाटो और उसके सहयोगी देशों के तेल टैंकरों और जहाज़ों को इस मार्ग से गुजरने की अनुमति नहीं है।
इसके परिणामस्वरूप तेल और गैस की कीमतों में भारी उछाल आया है, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर दिया है।
मूल मुद्दे पर आएँ तो ईरान इस समय अकेले ही अमेरिका-ज़ायोनिस्ट इसराइली सैन्य गठजोड़ की पूरी ताकत का सामना कर रहा है और अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भारी नुकसान पहुँचा रहा है।पिछले आधे शताब्दी में यह ऐतिहासिक तथ्य है कि केवल ईरान ने ही आगे बढ़कर मध्य-पूर्व में फैले पूरे अमेरिकी सैन्य नेटवर्क को चुनौती दी है। बहरहाल इस संकट से अपने सहयोगी और पिछलग्गुओं को राहत देने के लिए,कच्चे तेल की कीमत को स्थिर रखने के लिए ट्रंप शासन ने रूस से तेल खरीदने पर लगे प्रतिबंध में एक माह की छूट दी है।

यह न केवल ट्रम्प शासन और अमेरिकी सैन्य-औद्योगिक पूँजी के लिए चुनौती है, बल्कि पिछले दो सौ वर्षों से चले आ रहे एंग्लो-सैक्सन साम्राज्यवाद को भी सीधी चुनौती है।
यह भी स्पष्ट है कि स्पेन जैसे कुछ देशों को छोड़कर यूरोप की प्रमुख शक्तियाँ और यहाँ तक कि भारत भी अमेरिका-ज़ायोनिस्ट इसराइली आक्रमण की खुलकर निंदा करने से बच रहे हैं।भारत का रवैया विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि वह ब्रिक्स का संस्थापक सदस्य है और उसे ब्रिक्स के एक अन्य सदस्य ईरान के साथ एकजुटता दिखानी चाहिए थी।ब्रिक्स का दूसरा सदस्य चीन,जहां अमरीका के साथ प्रतिद्वंदिता में लगा हुआ है,लेकिन यह अपने तथाकथित “कूटनीतिक संयम” को मजबूती से दर्शा रहा है।साथ ही यह बीजिंग में ट्रंप के साथ तयशुदा शिखर वार्ता की तैयारी में व्यस्त है।जिसमें दुनिया को लूटने के लिए विभिन्न साम्राज्यवादी ताकतों के” बहुध्रुवीय” व्यवस्था का रोडमैप बनाया जाने की संभावना है।

दरअसल ईरान पर यह हमला अचानक नहीं हुआ। इसकी पृष्ठभूमि 2018 में ट्रम्प द्वारा ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) से एकतरफा हटने से बननी शुरू हुई थी।इसके बाद से ईरान पर लगातार आरोप लगाए जाते रहे कि वह परमाणु हथियार कार्यक्रम फिर से शुरू कर रहा है—ठीक वैसे ही जैसे 2003 में इराक पर “विनाशकारी हथियारों” के झूठे आरोप लगाकर हमला किया गया था।अंततोगत्वा 28 फरवरी 2026 को ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अपने अपराधिक और गैरकानूनी आक्रमण को थोप दिया।ट्रंप के अमरीकी आलोचकों के तर्क के विपरीत ,यद्यपि मौजूदा हमले के पीछे जेफ्री एपस्टाइन फाइल एक तात्कालिक कारण हो सकता है,लेकिन जैसा कि वेनेजुएला में ट्रंप ने हस्तक्षेप किया,वैसे ही ईरान पर विनाशकारी आक्रमण के पीछे अमरीकी साम्राज्यवाद के निश्चित हित जुड़े हैं।और जैसा कि विश्लेषण किया जा रहा है कि अमरीकी इसराइली दुष्ट धुरी ने साइबर विशेषज्ञता,गुप्तचर नेटवर्क,संचार और विश्लेषण तकनीकी के सभी संसाधनों का प्रभावशाली उपयोग करते हुए खमेनेई की गतिविधियों को ट्रैक किया और पहला मौका मिलते ही उनकी हत्या कर दी गई।

फिर भी ईरान का लगातार प्रतिरोध साम्राज्यवादी अमेरिका और उसके सहयोगी ज़ायोनिस्ट इसराइल की रणनीतिक कमजोरी को उजागर कर रहा है।
यह दिखाता है कि अमेरिकी साम्राज्यवाद का भौतिक आधार कमजोर हो चुका है और वह दुनिया भर में फैले सैकड़ों सैन्य अड्डों को बनाए रखने में असमर्थ होता जा रहा है।इस परिस्थिति ने ईरान को राजनैतिक रूप से युद्ध को स्थाई रूप से समाप्त करने के लिए इसकी तार्किक और सुसंगत शर्तों को मजबूती से रखने में सक्षमता प्रदान की है। ईरान ने आक्रमणकारी ट्रंप और नेतनयाहू के द्वारा ईरान को निःशर्त आत्मसमर्पण
करने की मांग के आगे नतमस्तक होना स्वीकार नहीं किया।
इसी बीच सूत्रों के अनुसार,पेंटागन के निर्देश पर अमरीकी नौसेना ईरान में लंबे समय तक जमीनी युद्ध में भिड़ने की तैयारी कर रही है।

ऐसे संकटजनक परिस्थिति में ईरान ने इस गैरकानूनी युद्ध को स्थाई रूप से समाप्त करने के लिए तीन शर्तें रखी हैं:

  1. ईरान के एक संप्रभु देश के रूप में सभी वैध अधिकारों की मान्यता।
  2. आक्रमणकारियों द्वारा युद्ध की क्षतिपूर्ति दी जाय।
  3. भविष्य में आक्रमण न होने की बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय गारंटी दी जाए।
    इस बात को पूरी तरह जानते हुए कि बिना दांत के संयुक्त राष्ट्र संघ जो कि अमरीका के नेतृत्व वाले साम्राज्यवादी ताकतों का एक नवउपनिवेशिक औजार है कि अप्रासंगिकता उजागर हो चुकी है,ईरान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष ये मांगें रखी हैं।

इस संघर्ष ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है—दुनिया में परमाणु हथियारों पर कुछ साम्राज्यवादी शक्तियों का एकाधिकार बना हुआ है।जिनमें सबसे दुष्ट आतंकी अमरीकी और इसराइली ताकतें बिना परमाणु हथियार वाले देशों को कई तरह से धमका रहे हैं।
इन्हीं ताकतों में साम्राज्यवादी अमेरिका एक मात्र ताकत है जिसने 1945 में जापान पर परमाणु बम गिराया था, जबकि आज वही अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी IAEA और परमाणु अप्रसार संधि NPT का इस्तेमाल कर,ईरान पर परमाणु हथियार कार्यक्रम का आरोप लगाकर हमला कर रहा है।दूसरी ओर ज़ायोनिस्ट इज़राइल ने एंग्लो-सैक्सन साम्राज्यवाद के संरक्षण में परमाणु हथियार हासिल किए हैं।इसलिए जब तक पूर्ण वैश्विक निरस्त्रीकरण नहीं होता, हर राष्ट्र के लोगों को यह अधिकार होना चाहिए कि वे स्वयं तय करें कि उन्हें परमाणु हथियार रखने हैं या नहीं।

इससे जुड़ा दूसरा प्रश्न है दुनिया भर में फैले अमेरिकी सैन्य अड्डों का।
अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सीरिया, वेनेज़ुएला और अब ईरान में अमेरिकी हस्तक्षेप ने दिखा दिया है कि अमेरिकी साम्राज्यवाद ने इतिहास में सबसे अधिक हिंसा और आतंक फैलाया है।
इसलिए दुनिया के सभी देशों की जनता को इन अमेरिकी सैन्य अड्डों के खिलाफ उठ खड़ा होना चाहिए और मध्य-पूर्व से इनकी तत्काल वापसी की मांग करनी चाहिए।

इसी के साथ गाज़ा और अन्य कब्ज़े वाले क्षेत्रों से ज़ायोनिस्ट इजरायल की वापसी, लेबनान से कब्ज़ा हटाना और एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष फ़िलिस्तीन की स्थापना की मांग भी जुड़ी हुई है, जहाँ सभी मूल निवासी समान नागरिक अधिकारों के साथ रह सकें।इसी के साथ ट्रंप द्वारा गाज़ा के बारे में गठन किए गए बोर्ड ऑफ पीस जो कि गाज़ा को एक टूरिस्ट -वित्तीय- सैनिक केंद्र के रूप में बदलने की मुहिम को मजबूती से नकारने से भी जुड़ा होना चाहिए।

इस गंभीर परिस्थिति में हम दुनिया के सभी मजदूरों और उत्पीड़ित जनता से आह्वान करते हैं कि वे अमेरिकी साम्राज्यवाद और नव-फासीवादी इसराइली ज़ायोनिज़्म के विरुद्ध ईरानी जनता के ऐतिहासिक प्रतिरोध के साथ एकजुट हों।

ईरान की जनता के वीरतापूर्ण ऐतिहासिक प्रतिरोध को लाल सलाम!

अमेरिका-ज़ायोनिस्ट इसराइली दुष्ट गठबंधन मुर्दाबाद!

दुनिया के मजदूरों और उत्पीड़ित जनता की साम्राज्यवाद-विरोधी, फासीवाद-विरोधी एकता ज़िंदाबाद!

अंतरराष्ट्रीय विभाग
सीपीआई (एम-एल) रेड स्टार

नई दिल्ली
14 मार्च 2026

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